स्वप्न

छविगृह से शारीरिक व मानसिक रूप से थका हरा मैं लौटा तो निराशा के कोहरे में आस्था का सूर्य डूब चूका था | प्रेरणा से परिपूर्ण असंख्य दृश्य जिन आँखों से देखे थे उन्ही से अंतिम दो तीन व्यंग्यात्मक दृश्य देखकर मेरे चिंतन में किंकर्तव्यविमूढ़ता का अँधेरा गहरा होता जा रहा था | अब तो दर्शक भी नहीं रहे , अकेला खो गया अपने आप में , सो गया अपनी शय्या में |
फिर वाही दृश्यों का सिलसिला , किन्तु इस बार दृश्यपटल नहीं था , दर्शकों का जमघट नहीं , ध्वनी यंत्रो का शोर शराबा नहीं , मैं ही दर्शक , मैं ही दृश्य और मैं ही ध्वनी संयोजक | कुछ खो गया था जिसे ढूंढ़ना चाहता था | क्या वह संजीवनी थी जो मूर्छित जीवन में नवप्राण का अभिसिंचन कर दे ? क्या वह आस्था और आत्म विश्वास की तूलिका थी जिसके बिना कर्म चित्रित ही नहीं होता ? क्या वह चिंतन के सूत्र थे जिनसे आत्म-प्रेरणा के ताने -बाने बुने जाते है ?
लो आत्मयज्ञ की ज्वाला धधक उठी | शंख ध्वनि ने नवप्रभात की घोषणा की | वज्र निश्चय के समक्ष अन्धकार क्षीण होने लगे | मेरे भीतर का भीष्म -पितामह बोल उठा - यही है संजीवनी | भीतर के कुमारिल भट्ट ने कहा -संकल्प लो,संकल्प | फरफराती ध्वजा से त्वरित , कृपाण की धार पर नृत्य करता, उठी हुई भुजा के सहारे उठता हुआ एक संकल्प , एक विराट संकल्प ,मेरे भीतर समा गया | मुझे राह मिल गयी |
चल पड़ा बिसाती की तरह -जीवन व्यापार करता, उस निर्झर की तरह जो केवल बहना जानता है | इस युग में इतनी तपस्या क्या कम होती है ? वन्य प्रदेश भी जनाकुल हो गए , निर्झर के किनारे तीर्थ हो गए ? मैंने मोरों को पूछा आकाश में गरजने वाले बादलों के घिर जाने से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है , कि तुम नाच उठते हो | वे नृत्य में मस्त थे , प्रश्न से भयभीत वे नृत्य करना ही भूल गए | मैंने पतंगों से पूछा यज्ञ प्रकाश से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है कि तुम बिना सोचे समझे ही आग में कूद पड़ते हो | वे केवल इतना कह पाए , हमें बहका कर कोई नहीं लाया , अपने आप आये है | पर उत्तर के साथ ठहर गए | पतंगों के जलने और मोरों के नाचने से मुझे क्या शिकायत थी भला ! मैं तो कारण जानना चाहता था | पर वे कारण नहीं बता सके |
हठात मैं अपने आपको ही यह सवाल पूछ बैठा | मैं बिसाती की तरह क्यों चल रहा हूँ ? निर्झर की तरह क्यों बह रहा हूँ ? जीवन देने और लेने वाले सौदागर मिल गए , किनारों को तीर्थ बनाने वाले यात्री मिल गए -क्या यही था मेरे अभियान का कारण ? पर यह तो परिणाम है -कारण नहीं | उलझ गया | उलझ कर थक गया | थक कर रुक गया | बिना कारण जाने कर्म भी तो कैसे हो ?
किसी ने कहा - आगे बढ़ो , रुको मत | पूछ ही बैठा -क्यों ? उत्तर था , - तुम्हें जीवन के व्यापारी मिलेंगे , पवित्र तीर्थ यात्री मिलेंगे | कितना भ्रामक था उत्तर |
मुझे नहीं चाहिए व्यापारी | क्या करूँगा धनि बन कर मुझे नहीं चाहिए वे यात्री जो मुझे पवित्र सिद्ध करदे | कैसे मिट जाएगी मेरी अपवित्रता उनकी घोषणा मात्र से | और फिर क्या कहूँगा उस पवित्रता को लेकर ही | मुझे कुछ नहीं चाहिए |
' पर मुझे चाहिए , तुम मेरे लिए आगे बढ़ो , मेरे लिए कर्म करो |'
' हाँ यह कोई उत्तर है , पर कौन हो तुम और क्या सम्बन्ध है तुम्हारा मुझ से ?"
' मैं कौन हूँ इसका उत्तर दिया नहीं जाता , खोजा जाता है , प्राप्त किया जाता है | हाँ , सम्बन्ध की व्याख्या कर देता हूँ , तुम मेरे हो बस |'
उतर का तीर हृदय के निशाने पर पूरा बैठा | उस उत्तर का मेरे पास कोई प्रत्युत्तर नहीं था | आत्मीयता का प्रत्युत्तर आत्मीयता ही है | सचमुच मैं प्यासा था | अपनों की खोज का प्यासा | मुझे प्यार की प्यास थी जिसे ज्ञान का अहंकार नहीं बुझा सकता था | मुझे कर्म की थकान थी जिसे उपार्जन का अहंकार नहीं मिटा सकता था | योग का आधार मिल गया , संगठन का सूत्र मिल गया और मेरे अस्तित्व का ओचित्य भी मिल गया |
मेरी सत्ता के स्वामी की चाह को पूरा करना ही होगा | पतंगों के बिना सोचे समझे प्रकाश में खो जाने का कारण मिल गया | बादलों के गर्जन के साथ मोरों के नाचने का सम्बन्ध स्पष्ट हो गया | पुरातन पंथ पर मेरी चिर नवीन प्रेरणा फिर चल पड़ी | इस बार प्रत्येक कदम के साथ थकान के साथ उमंग बढ़ने लगी | बंजर भूमि में पुष्प खिलने लगे , पत्थरों में संगीत फूट पड़ा , मनुष्य उससे प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता था ? नए इतिहास की कलम चल पड़ी . पटकथा ही बदल गई , भविष्य के बाल चित्र दृश्यपटल पर रेखांकित होने लगे | अब ज्ञात हुआ कलाकार से निर्देशक कितना बड़ा होता है | कितना सजीव हो गया चित्रपट , कितना अलौकिक और आल्हादकारी बन गया संगीत , कितना समृद्ध बन गया यह लूटा हुआ जीवन | तन-मन-धन और जीवन की समस्त दरिद्रताओं से मुक्ति मिलने लगी | समूचा युग लक्ष्मी , भवानी और सरस्वती तीनो का सहयोगी और सामूहिक क्रीड़ा स्थल बन गया | नई धार्मिक और सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात हो गया |
शंख बज उठा | सृजन का सत्य स्वरूप , ब्रह्मा का नाद , ब्रह्मा को साकार करने वाला अनादि शंख | चिद्रूप भगवान विष्णु का पुष्टि करने वाला और मंगल स्वरूप विषपायी शंकर का कल्याण कारक शंख भी बज उठा | यह तीनो ध्वनियाँ फिर एक ही शंख से निनादित हो उठी , पांचजन्य से |
सुदूर क्षितिज पर नए ग्राम समूह कि आकृतियाँ उभर रही है | ग्रामवासी सुशिक्षित ,संस्कारी और सदाशयी है | श्रम उनका देवता है , लक्ष्य उनकी आसक्ति है , कर्तव्यबोध उनकी प्रेरणा है | यह भव्य संस्कृति का जिर्नोद्दार है | यही जीवन यज्ञ की यज्ञ शाला है |
नींद टूट गई , उसे टूटना ही था पर स्वप्न नहीं टूटा क्योंकि उसे साकार होना ही था | क्षत्रिय तो वे भी थे और ये भी है |
चित्रपट अब भी चल रहा और दृश्य अब भी बदलते जा रहे है |

स्व. श्री तन सिंह का यही स्वप्न श्री क्षत्रिय युवक संघ के रूप में साकार हुआ जो आज भी क्षत्रिय युवाओं को सुशिक्षित ,संस्कारी , सदाशयी और देश भक्त बनाने के अपने अभियान में तल्लीनता से जुटा हुआ है |


ज्ञान दर्पण : होनहार के खेल |
मेरी शेखावाटी: भूत प्रेत और अलोकिक शक्तियां|
धरती माता किसने रखी लाज तेरे सम्मान की

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Comments :

1
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
on 

नए ग्राम समूह कि आकृतियाँ उभर रही है | ग्रामवासी सुशिक्षित ,संस्कारी और सदाशयी है | श्रम उनका देवता है , लक्ष्य उनकी आसक्ति है , कर्तव्यबोध उनकी प्रेरणा है | यह भव्य संस्कृति का जिर्नोद्दार है | यही जीवन यज्ञ की यज्ञ शाला है |
ऐसे स्वप्नदृष्टा ही समाज को बदलने में अपना योगदान कर पाते हैं। स्व. तनसिंह जी को प्रणाम!

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