चेतक की समाधि से -2

भाग -१ से आगे ...........


यह चेतक की समाधि है | मैंने झुक कर प्रणाम किया | महान चेतक और उसके अद्वितीय मालिक ! तुझे शतश: प्रणाम है और तभी एक गंभीर आवाज का प्रवाह बह चला - " पथिक ! जितना मैंने देखा उतना तुमने सुना भी नहीं | तुम्हारी तरह मेरे भी दिन थे , मदमाते और रंगराते दिन थे , इठलाते और बल खाते दिन थे , मुस्कराते शैशव और अलसाते यौवन के दिन थे | पता नहीं तुमने तो किस दुःख और पीड़ा में जवानी की ऐसी उमंग को ताक पर रख दिया है , पर मैं तो अपने उन दिनों में खूब कूदता और उछलता था | न दुनिया को मेरी परवाह थी और न मुझे दुनियां की परवाह थी | हाँ , उन बे-परवाह दिनों में मेरी माँ ने एक दिन जरुर कहा था - " स्वामी के काम आना ही अपने कुल की रीत है |" और मैंने उस रीत को निभाने का वचन दिया था |

" एक दिन किसी ने मेरी पीठ को सहलाया | मेरे ललाट पर हाथ फेर कर गर्दन को सहलाया | मैंने उसे देखा | उसकी रक्तिम आँखों में दृढप्रतिज्ञा दिखाई दे रही थी | उसके हाथों में विधाता की कुशल कारीगरी देखी | उसके मन में के स्वप्न , एक अमिट-अरमान , एक अनुकरणीय साध का संकल्प देखा और हृदय में देखा - भाग्य से मुंह फिर कर जमाना करवट बदल रहा है | फिर भी न जाने मुझे कैसे विश्वास हो गया , कि जौहरी तो यही है | और मैं बिना मूल्य उनके हाथों बिक गया |


" दिन बीतते गए और दिन बदलते गए | कर्म योगियों के पुरुषार्थ लड़ते रहे और उनके तक़दीर बदलते गए | मैं खूब घुमाया गया | मैंने पहाड़ देखे | गुफाएं देखी | नदी नालों और जंगल -जंगल को देख डाला | मैंने पत्तल देखी | घास की रोटियां देखी | महलों के वैभव के बाद मैंने पत्थरों की शय्या और बांह के सिरहाने देखे | मैंने सुकुमार बच्चों को देखा | वन-बिलाव को उनसे घास की रोटियां छीन कर भागते देखा | महलों की महारानियों को मैंने जंगल में सिर पर पानी लाते देखा | बिगड़ा हुआ तक़दीर किसी इंसान के साथ जो कुछ कर सकता है , वह सब मैंने देखा | मैंने उनकी आँखों में आंसू देखे , अपने ही लोगों की बेवफाई पर उनके दिल को चरमरा कर टूटते देखा , परन्तु उनके सिर को भगवान एकलिंगनाथ के सिवाय किसी के सामने झुकते नहीं देखा |  



" एक दिन समाचार आया ,कि आमेर के राजकुमार मानसिंह सिर्फ हजार घोड़ों के साथ यहीं की पहाड़ियों में शिकार खेलने आये है | मैंने सोचा ,अपनी माँ को दिए गए वचन को पूरा करने का दिन आ गया है | मेरी बांछे खिल गयी , मेरी बोटी -बोटी फड़क रही थी - ऐसे सुनहरे अवसर की प्राप्ति पर | किन्तु उन्होंने कहा - " गाफिल शत्रु पर वार करना क्षत्रिय का धर्म नहीं है " उस दिन मैंने सोचा - मेरे धर्म से भी बढ़कर क्षत्रिय धर्म है और मैंने निर्णय किया , कि मैं भी क्षात्र धर्म निभाऊंगा |

"एक दिन की बात है - वे शिकार खेलने गए | वहां उन्होंने एक सूअर पर भाला चलाया | बेचारा सूअर मर्मान्तक पीड़ा से आहात होकर भागने लगा , पर उसका भागना उसकी भूंडण को सहन नहीं हुआ | ललकार कहने लगी -

सुण सूरा भूंडण कहै , भाज्यां कुळ लाजंत |


इण धरती रा निपज्या , तीतर नह भाजंत ||



( भूंडण कहती है - हे सूअर ! सुनो , भागने से कुल परम्परा लज्जित होती है | इस भूमि पर उत्पन्न होने वाले तीतर भी नहीं भागते |)


" इतना सुनते ही सूअर के पैर रुक गए | उसने घूमकर मुझ पर प्राण घातक आक्रमण किया | यधपि मैं बचा लिया गया , किन्तु मैंने भी विचार किया - कि क्योंकि मैं भी इसी  धरती में निपजा हूँ , इसलिए युद्ध से कभी न भागूँगा |


क्रमश :.........


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Comments :

3 comments to “चेतक की समाधि से -2”
ताऊ रामपुरिया said...
on 

बहुत लाजवाब श्रंखला चल रही है जी.

रामराम.

k g said...
on 

sundar lekh, aanand ki anubhooti hui chetak ko sajeev kar diya shabdon ne . dhanyawad

Udan Tashtari said...
on 

अच्छा लगा पढ़्कर और चेतक की समाधि देख...आभार इस श्रृंख्ला का. जारी रहिये, शुभकामनाएँ.

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