प्यास लगी हो रुक रे मुसाफिर

प्यास लगी हो रुक रे मुसाफिर , यहाँ का पानी पीते जा |
शायद है , तू हार चूका पर , आज की बाजी जीते जा ||

कुछ बंद पड़ा है तालों में , तुम याद न जग के ख्यालों में
घोड़ों नरों खगधारों का , पानी गया पातालों में
लौट पड़े न पड़े तू मेरी , व्यथा के प्याले पीता जा || शायद ...

माना मंजिल लम्बी है , रुकजा निपट अकेला है
प्यास नहीं जल संचित हो , प्यासों का यह मेला है
यह नगरी हम राही तेरी , तू अपनी गगरिया रीते जा || शायद ...

तक़दीर की चुभती शूल कहीं , जनम-जनम की भूल नहीं
हिम्मत को अवसर से तोल , शायद खिलेंगे फूल यहीं
टूट न क्षण में धीरे - धीरे , अकथ कहानी बीते जा || शायद ...

कह दूँ फिर भी शेष रहेगी , बात एक जो कहानी रे
पंछी तो उड़ जाय मगर यह , उड़ न सकेगी टहनी रे
याद रहेंगे युग-युग के ये , घाव चाहे तू सीते जा || शायद ....
13 मार्च 1964


बङगङां बङगङां बङगङां-4

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Comments :

2 comments to “प्यास लगी हो रुक रे मुसाफिर”
Udan Tashtari said...
on 

बढ़िया...

ताऊ रामपुरिया said...
on 

बहुत सुंदर और ओजस्वी.

रामराम.

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