नजौगे -२ ?

भाग एक से आगे ........
तू तू मैं मैं इतनी बढ़ गयी थी कि आसपास के दो चार पडौसीयों के ८-१० बच्चे समीप आने का दुस्साहस न करते हुए दूर से ही संजय की भांति इस महाभारत का आँखों देखा आनंद उठा रहे थे | चपरासी कह रहा था , आधा हिस्सा उस अकेले का है और तांगे वाला व मजदूर कह रहा था कि धन और धरती के समान बंटवारे का सिद्धांत आज से तीन पीढ़ी पहले सरकार द्वारा स्वीकृत हो चूका है | संगठन के हिमायती दीनू ने सहज उदारता दिखाते हुए अपने हिस्से का परित्याग और शेष तीन का बराबर बंटवारे का प्रस्ताव रखा | इस पर आँखे तरेरते हुए ठाकुर हीराचंद ने घुड़की दी , - " चल भिखमंगे कहीं के ! अपने हिस्से का तो धक्का भी मैं खाऊंगा , पर अपना हक़ किसी भी हालत में नहीं छोड़ सकता , समझे ! मेरे घर बार है , इज्जतदार आदमी हूँ , तेरी तरह भिखमंगा नहीं !"
सहसा दृश्यपटल पर मेरी तस्वीर उतर आई और मैंने उन्हें समझाना शुरू किया , 'यह पत्थर बहुत तुच्छ चीज है , उसके लिए तुम क्यों लड़ते हो , मैं तुम्हारा प्रपितामह हूँ |' इस पर उदार और सहिष्णु दिखने वाला संगठन का हिमायती भिखारी दीनू मुझ पर झपट पड़ा और उसने मेरा गला पकड़ लिया - ' आइये प्रपितामह जी ! उपदेश देने की तो शायद आपकी पुरानी आदत होगी , पर यह तो बताईये , अब हमारे पास लड़ने झगड़ने , शौर्य और वीरता प्रदर्शित करने , स्वधर्म पालन और इतिहास बनाने के लिए इन २०० पत्थरों के सिवाय रखा ही क्या है ? हमारी इस दर्दनाक दुर्दशा के कारण तुम हो , प्रपितामह जी ! इस पर भी हमारी मध्यस्ता की बेशर्मी करना केवल आप जैसे साहसी लोग से ही संभव है | यदि हमारे पूर्वजों और हमारे बीच आप जैसी निक्कमी और नाजोगी पीढ़ी न होती तो मैं होटलों के झूठे दोने कभी नहीं चाटता | मेरे पराक्रम दिखाने का क्षेत्र होटलों के पिछवाड़े में निर्बल याचकों और भूखे कुत्तों के बीच रह गया है | इस सबके उत्तरदायी तुम हो - मेरे प्यारे नपुंसक प्रपितामह जी...!
ऐसा लग रहा था जैसे सभी फिल्म निर्माताओं ने मेरे विरुद्ध इस प्रकार का अपमानित और लज्जित करने का भयानक षड्यंत्र रच रखा हो | मैं अँधेरे में कुर्सियों से टकराता हुआ , कई दर्शकों से अंधे की उपाधियाँ धारण करता हुआ , भद्र महिलाओं से अंग्रेजी में क्रोधित गालियों की फुसफुसाहट लेता हुआ , छविगृह से बाहर भागने लगा | उठते हुए मेरे पडौसी ने दर्शकों ने पूछा - क्यों भाईसाहब ! क्या आप जा रहे है ? मार्मिक दृश्य तो अभी शुरू ही हुए है और फिल्म भी अभी काफी बाकि है |
लेकिन मेरे मर्म को सहनशक्ति का अभाव महसूस हो रहा था और जितनी फिल्म देखली थी उससे अधिक देखने की कोई नहीं रही | बडबडाता हुआ मैं बाहर आया | टिकटघर पर भीड़ लगी थी | किसी ने पूछा - क्यों भाई साहब ! फिल्म कैसी है ? दुसरे ने पूछा - क्यों जी फिल्म ख़त्म हो गई क्या ? चौथे ने कहा - क्यों साहब आपकी बोलती बंद क्यों हो गई ? गूंगे हो गए हो क्या ? और मैंने एक ठहाका सुना | कान बंद कर मैं वहां से भगा और घर आकर सांस ली | देखा मेरे मकान पर पड़े हुए वे २०० पत्थर ज्यों के त्यों पड़े है | पर लग रहा था जैसे व्यंग्य में वे सभी मुझ पर मुस्करा रहे है और जैसे कह रहे है - तुम नि:संदेह एक क्षत्रिय हो |


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Comments :

1
ताऊ रामपुरिया said...
on 

लाजवाब और अदभुत प्रवाह है इसमे. आभार.

रामराम.

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