वाह बुंदेलखंड ! वाह !! धन्य मालवा ! धन्य !!

चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे उन्ही दृश्यों में
मैंने महोबे के राजा परमदिदेव को देखा | बेतवा के किनारे मैंने उसकी सहायता में लड़ते बांके वीर आल्हा और उदल के साथ उनकी माता देवलीदेवी को देखा | दूसरी बार फिर उरई के पास आल्हा को पृथ्वीराज की सेना से लोमहर्षक युद्ध करते देखा | मैंने इतिहास प्रसिद्ध कालिंजर के दुर्ग को देखा और उस पर अनवरत और भयानक युद्ध होते देखे | इसी दुर्ग पर मैंने कुतुबुद्दीन ऐबक , शमसुद्दीन , अल्तमश ,गयासुद्दीन बलवन व नसीरुद्दीन मुहम्मद की चढाईयां देखि जिसमे रोंगटे खड़े करने वाली वीरता को नाचते देखा | मैंने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह की रायसिन पर चढाई देखि जहाँ दुर्गावती को सात सौ स्त्रियों सहित जौहर करते देखा | मैंने बाबर को चंदेरी के मेदिनिराय पर चढ़ आते देखा और शत्रु की आंधी के समक्ष मेदिनिराय को शाका करते देखा | चंदेल वंश की अंतिम ज्योति कीर्तिपाल को शेरशाह से लड़ते देखा | गोंडवाने की अतुल संपत्ति को लुटने अकबर की और से आसफखान को सिंगोरगढ़ पर हमला करते देखा और उसका सामना करते हुए दोनों हाथो से तलवार चलाते हुए दल्पतिशाह की विधवा रानी दुर्गावती को देखा | मैंने मधुकर शाह को देखा जिसने अकबर के सेनापति न्यामतकुली को निचा दिखाया,जामकुली को निचा दिखाया | मैंने मधुकरशाह के पुत्र वीरसिंहदेव को देखा जिसके भय से हसनखां को भांडेर छोड़ कर भागते देखा | ईचीखां को एरछ छोड़ कर भागते देखा , बाघजंग जांगडा को हथनौरा छोड़कर भागते देखा , मुग़ल थाने को बडोनी से भागते देखा ,आंतरी के पास पराईछे गांव में मैंने अबुलफजल को यमलोक भागते देखा , एरछ के पास जमालखां को यमलोक भागते देखा | बुंदेलखंड को कई बार मुगलों के हाथों जाते और पुनः वीरसिंह देव के हाथो आते देखा | फिर झमलोटा के पास खडगराय को प्राण खोकर भागते देखा और खमोली के समीप मुग़ल सेनापति अब्दुलखान को प्राण बचाकर भागते देखा | और अंत में वीरसिंह देव को ओछडा का राजा बनते देखा | मैंने स्वयम शाहजहाँ को ६०,००० सैनिको के सहित चम्पतराय की मार से भागते देखा | शाहबाजखां, बाकीखां , और फतहखां को कब्रों में जाते देखा | अंधेर में चम्पतराय के पुरुषार्थ के सितारे को बाहर निकलते देखा ,स्वातन्त्र्य भावना को जगाते और गौरव से सिर उंचा उठाते देखा | उसी चंपतराय के आँगन में यशस्वी छत्रसाल का युद्ध क्षेत्रों में जन्म देखा | छत्रसाल का मरहटो से गठबंधन देखा | मुग़ल साम्राज्य को उनके समक्ष गुर्राते ,फिर थर्राते ,डगमगाते ,घुटने टेकते और जर्जरित होते देखा | गौ, ब्रह्मण और हिंदुत्व के अमर पुजारी वीर शिरोमणि छत्रसाल को मै देखता ही रह गया और अंत में मै थक कर कह उठा - वाह बुंदेलखंड ! वाह !! धन्य मालवा ! धन्य !!
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कितने नाम गिनाऊ और किस किस का वर्णन करूँ ? किसको आदर्श मानूं किसको न मानूं ? किस धरती को श्रेष्ठ मानूं और किसे मरुस्थली कहूँ ? मेरी आँखे धन्य हो गयी इन बदलते दृश्यों को देखकर | मन चाहता है ,काश ! ये आँखे फिर कभी ऐसा दृश्य देख सके | पर आखिर यह थे कौन ? मेरे शरीर का रोम रोम ही नहीं , मेरी स्मृति का कण-कण ही नहीं ,इस धरती का चप्पा चप्पा , इतिहास का जर्रा जर्रा और समय पट्ट का धागा धागा कहता है - वे सभी नि:संदेह क्षत्रिय थे |
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे |
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Comments :

2 comments to “वाह बुंदेलखंड ! वाह !! धन्य मालवा ! धन्य !!”
Pandit Kishore Ji said...
on 

waah dhanya

ताऊ रामपुरिया said...
on 

बहुत लाजवाब श्रंखला शुरु की आपने. इतिहास से रुबरु कराती इस श्रंखला को अनवरत लिखते रहिये.

रामराम.

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