क्षिप्रा के तीर -3

भाग-१,भाग -२ से आगे ..........
खिंची मुकंद दास मेरे जीवन -दीपक में तेल भरता रहा और मैं जिन्दगी भर जलता रहा | जलता रहा और जल-जल कर जलने की कहानी को जीवन का नाम देता रहा | जब जलने का अमर इतिहास निर्मित हो रहा था , तब मैं बुझ भी कैसे सकता था | बड़ी कठिनाईयों और कष्टों के बीच मैंने अजीत सिंह का रक्षण , पालन और पोषण किया | स्वामी के नमक की पाई -पाई की मैंने लाज रखी |
मारवाड़ का राज्य देने की मुझ पर लालच की फांसी फैंकी गई और मैंने उसे छलना और फिसलन समझकर राजपूत चरित्र की लाज रखी | राज्य के मोह से छाला जाता तो निश्चय ही तुम मेरे नाम पर थूकते | मैंने एक अत्यंत साधारण और सामान्य राजपूत घराने में जन्म लिया तो क्या हुआ , मैंने राजपूती की लाज रखी |
औरंगजेब के सामने एक दिन मेरा और शिवाजी महाराज का चित्र रखा गया , तो उसने शिवाजी के लिए कहा था - इस पहाड़ी चूहे को तो मैं पकड़ सकता हूँ , पर मेरे लिए कहा - 'किन्तु इस मारवाड़ी कुत्ते ने मेरी नाक में दम कर रखा है |' मैंने वास्तव में एक कुत्ते की तरह ही स्वामी भक्ति की लाज रखी |
अजीत सिंह के लिए एक दिन यवन सम्राट ने मेरा पीछा किया | अनेक कठिनाइयों को सहते हुए जब वह जालौर के पास पहुंचा , तब उसे मालूम हुआ कि मैं तो बहुत पहले अरावली की पहाड़ियों से ही उससे अलग होकर मालवा की तरफ आ गया | क्रोध में आकर उस समय उस धर्मान्द सम्राट ने अपनी पवित्र और श्रद्धेय कुरान को फेंक दिया | मेरी वह शानदार विजय थी | मैंने राजपूतों की राजनीतिज्ञता की लाज रखी |
मैंने मारवाड़ और मेवाड़ को ही एक सूत्र में नहीं बाँधा , मैं तो मरहटों से भी मिलने के लिए दक्षिण में गया था | मैं धरती का पुत्र था और मैंने इस धरती के सुहाग और स्वतंत्रता की लाज रखी |
कष्टों को मैंने घोड़े की पीठ पर ही चढ़कर सहन किया | तुम्हे आश्चर्य होगा , पर यह सत्य है , कि मैंने रोटियों को अपने भाले की अणि (नोक ) से सका और उन्हें घोड़े की पीठ पर ही बैठ कर खाया | ध्येय साधना के निमित किये गए तपस्वियों के तप की भी मैंने लाज रखी |
शत्रु की संतान मेरे हाथ लगी और उसे अपनी संतान की तरह पाला और पोषा | आश्रय में आये विपत्तिग्रस्त दुखियों पर मेरा हाथ कभी नहीं उठा | उस यवन सुन्दरी को तो मैंने कभी आँख से भी नहीं देखा | मैं एक आर्य था और मैंने आर्य चरित्र की भव्यता की लाज रखी |
तुम समझ रहे हो , मैं आत्मश्लाघा में बहता जा रहा हूँ | नाम कमाने की मेरी इच्छा कभी नहीं हुई | मैं तो हनुमान था | तेल और सिंदूर पर ही संतुष्ट रहा | मैं आत्मश्लाघा नहीं कर रहा हूँ , अपनी व्यथा कह रहा हूँ तुमसे | तथ्य कह रहा हूँ - केवल तथ्य , क्योंकि जीवन में सदैव सत्य की ही मैंने लाज रखी है |
क्रमश: ............

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Comments :

4 comments to “क्षिप्रा के तीर -3”
Udan Tashtari said...
on 

बहुत आभार इस प्रस्तुति का,

ताऊ रामपुरिया said...
on 

बहुत ही लाजवाब श्रंखला.

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
on 

पिछली दो कड़ियाँ भी पढ़ीं पर यह योद्धा कौन है यह ठीक से स्पष्ट न हुआ।

Ratan Singh Shekhawat said...
on 

दिनेश जी
यह महान योद्धा मारवाड़ का इतिहास प्रसिद्ध स्वामिभक्त वीर दुर्गादास राठौड़ है जिनका निधन उज्जैन में क्षिप्रा के तीर पर हुआ था और वहीँ उनका स्मारक बना हुआ है |

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