क्षिप्रा के तीर -2

भाग- १ से आगे ....
जो मुझे बुला रहा है - घोड़े पर चढ़ा हुआ , हाथ में भाला लिए | तो सुनें , उसके पास जाकर , वह क्या कहना चाहता है ?

वि.स. 1695 की श्रावण शुक्ला चतुर्दशी को मुझे एक माता मिली और मैंने उस जननी को कभी लज्जित नहीं होने दिया | ममता के क्षण आये , स्मृतियों के सुनहले और रुपहले अवसर आये , पर मुझे उसकी नहीं , उसके दूध की याद आती थी | वह मुझे बहुत प्रिय थी , पुन्य लोकों से भी प्रिय , परन्तु उससे और सबसे प्रिय थी मुझे उसकी लाज | इसलिए मैंने सभी सुखों को ठोकर मारकर , अनेक कठिनाईयों को सहकर , माँ के दूध की लाज रखी |
दुनियां मेरे विषय में बहुत कुछ जानती है , पर यह नहीं जानती , कि मैंने भी विवाह किया था | स्नेह के मांगलिक और मादक अवसरों को सहज में ही कौन ठुकराता है ? किन्तु कर्तव्य पालन के क्षणों में मैंने घूमकर भी उसकी तरफ नहीं देखा | वह मुझे उलाहने दे सकती है, मुझे निर्मोही भी कह सकती है , लेकिन यह नहीं कह सकती , कि मैंने उसके चूड़े की लाज नहीं रखी |
ठाकुर रूप सिंह की हवेली का वह दिन मुझे अच्छी तरह याद है , जब दिल्ली में जोधा महेशदास जी ने मेरे मालिक की प्राणप्रियाओं को तलवार के घाट उतार दिया था | आग में जलने का वक्त ही कहाँ था और इसीलिए खून का घूंट पीकर मैंने बहते हुए खून को देखा | मेरा खून अपने कर्तव्य की याद दिला रहा था और मैंने उस दिन देखा , कि कर्तव्य - पालन के मार्ग पर अपने विश्वासों के लिए मरने की अपेक्षा , जीना अधिक कठिन है | पर मैंने कठिन होते हुए भी अपने कर्तव्य की लाज रखी |
उस दिन मुगलों ने हमें घेर रखा था | उनकी संख्या बहुत थी पर हम तो इने गिने ही थे | लेकिन उस दिन कर्तव्य का मुझे आदेश था , कि मैं मरुँ नहीं, घुल-घुलकर मरने के लिए जिन्दा रहूँ |मैंने आदेश का अक्षरश: पालन किया | कड़े घेरे को तोड़ दिया , थक भी गया था , खून से लथपथ भी हो गया था , पर जिन्दा रहा | मैंने जिन्दगी और मौत दोनों की लाज रखी |
मेरे भी बच्चे थे | निर्दोष कलरव से मेरा आँगन भी कभी मुस्कराता था | दुनियां के बच्चों को देखकर मुझे कई बार अपने घर की फुलवारी में फूले हुए उन निष्पाप पुष्पों कि याद आती थी | सुरमई घटाओं को देखकर , मुझे मालूम नहीं , शायद उन पुष्पों की आँखों में भी कभी मेरी याद के आंसू आते होंगे , परन्तु प्यार से मैंने न कभी उनको पुचकारा न कभी उनके आंसू पौंछे | औरंगजेब के भी बच्चे मुझे - " बाबा-बाबा " कहकर पुकारते थे , परन्तु मेरे बच्चे मुझे क्या पुकारते होंगे , मुझे पता ही नहीं | संतान से दूर रहकर भी मैंने आने वाली संतान के गौरव की लाज रखी |
एक दिन मुझे महाराजा जसवंत सिंह जी ने पूछा , कि मैंने उनके राईके ( ऊँटों की देखभाल करने वाला ) को कैसे काटा , और मैंने पास ही खड़े राईके का झट से सिर काटकर उदहारण दिया | पर दंड के बदले मुझे उनकी सेवा का पुरस्कार दिया गया और मैंने उनके अन्न की लाज रखी |
जमरूद के थाने पर शिकार करते हुए एक दिन हम पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे | मुझे नींद आ गयी | धूप आने लगी तो स्वयम महाराजा ने मुझ पर छाया की | उमराओं ने कहा - इस अदने आदमी के लिए आपने कष्ट क्यों किया ? तब उन्होंने उत्तर दिया था - ' उमरावो ! यह लघुता नहीं , गौरव है , क्योंकि आज मैं इस पर छाया कर रहा हूँ , एक दिन यह , मेरे कुल और सारी मारवाड़ पर छाया करेगा |' मैंने सारा जीवन खपा कर उनके वचनों की लाज रखी |
क्रमश:..........

ज्ञान दर्पण : उत्तर भड़ किंवाड़ |
मेरी शेखावाटी: शेखावाटी पर्यटन की नजर से|
राजपूत वर्ल्ड : साथी संभल-संभल कर चलना

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Comments :

1
ताऊ रामपुरिया said...
on 

अदभुत लेखन है.

रामराम.

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