चेतक की समाधि से -3

भाग -१भाग -२ से आगे ............
" एक दिन संवत १६३३ के जेष्ट सुदी २ , तारीख ३० मई १५७६ बुधवार के प्रभात काल में उनके शिविर में मंद स्वर में कुछ मंत्रणा सी हो रही थी | एक स्त्री -कंठ याचना भरे शब्दों में अनुनय कर रही थी - " मैं नाचना चाहती हूँ , जी भर कर नाचना चाहती हूँ | बहुत समय बीत गया है , एक बार तो कम से कम तुम भी मुझे नचाओ |" उत्तर में उन्होंने कहा - " मैं ताल दूंगा और तुम नाचना | " मुझे उन पर कभी संशय नहीं हुआ , किन्तु उपरोक्त मंत्रणा के सम्बन्ध में जिज्ञासा बनी रही | प्रभात काल में वे बाहर आये और मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा - " मैंने रणचंडी को नाचने का वायदा किया है - कैसा 'क साथ दोगे ?" और मुझे समझ आ गया , कि उगने वाला सूर्य क्या देखेगा |
" और अचानक सूर्यदेव पहाड़ों के पीछे क्षितिज रेखा से उचक कर देखने लगे | उन्होंने देखा - एक और अकबर की असंख्य मुग़लवाहिनी और दूसरी और देश-धर्म पर मर मिटने का संकल्प लिए कुछ बांके क्षत्रिय सैनिक ! दुरस्त प्रदेशों से उड़कर आई गिद्ध पंक्तियाँ दुरूह स्थानों पर बैठी प्रतीक्षापूर्ण तीक्षण दृष्टि से युद्ध स्थली का निरिक्षण कर रही थी | अपने लम्बे लम्बे डैनो को कभी फडफडा कर व्यग्र भाव से कभी चोंच और गर्दन को आगे की ओर प्रसारित कर वे कभी राजपूतों के मांसल पुट्ठों को लालचभरी दृष्टि से देखते थे , तो कभी मेरी छाती को देखा करते | ऐसा पवित्र और आत्म पोष्टिक मांस प्राप्त करने के लिए उनका कोई सगा -सम्बन्धी भी पीछे नहीं रहा था |
" थोड़ी ही देर में अपेक्षित ताल शुरू हुए , मारू बजने लगे , लोहे से लोहा टकराया , घोड़े दौड़ने लगे और हाथ बढ़ने लगे ; वीरों की हुंकारों ,सैनिकों के नारों और घायलों की कराहों से घाटी आर्तनाद कर उठी | यह माटी बड़ी वीर है ,पर उस दिन तो इस घाटी का हर पत्थर भय और वेदना से पीला पड़ गया | मैं थिरकने लगा | लग रहा था , जैसे पैर पृथ्वी पर पड़ ही नहीं रहे है | अपनी धारणा की पुष्टि के लिए नीचे देखा , तो वास्तव में मेरे अगले पैर मान सिंह के हाथी के सिर पर थे |उस समय दिग्गजों का बल मुझे में झूले खा रहा था | महावत और अम्बारी बच न सके , पर मान सिंह बच गए | उनके हाथी ने अपनी सूंड में बंधी तलवार से मेरे एक पैर पर वार किया और वह कट गया | फिर क्या था ,ताल बिलम्बित से द्रुत पर आ गए | मेरे साथ उनकी तलवार भी थिरकने लगी | एक कटा ,दूसरा कटा , तीसरा कटा , चौथा कटा , फिर तो थक कर मैंने गिनती ही बंद करदी | मैंने उसी दिन देखा , कि उनकी म्यान में चुपचाप पड़ी रहने वाली तलवार कितनी प्यासी थी | चौसठ योगनियाँ जब तृप्त हुई , तो बावन भैरूं उछल पड़े | उस दिन शायद उन्होंने अपने जीवन में पहली बार ही तृप्त होकर संतोष प्राप्त किया था | उनसे बचा हुआ रक्त जब नाले के रूप में कल-कल कर बहने लगा , तो रणचंडी की आँखे फट गई | मैंने तो इतना सुना - " बेटे ! जरा धीरे ताल दो , मैं थक गई हूँ |"
" पर उनकी तलवार नहीं थकी ; न तृप्त हुई | वे ताल देते ही रहे , जैसे रणचंडी की मनुहार उन्होंने सुनी ही नहीं हो | ताल चलते रहे ;चलते ही रहे ,जब तक कि रणचंडी स्वयं थक कर मूर्छित होकर गिर नहीं पड़ी | अचिन्त्य संग्राम के अक्ल्प्य दृश्य को देखकर अरुण ने सूर्य के सातों घोड़ों की बांगे एक साथ खिंच ली | वह ठगा -सा ठिठक कर रह गया था | सूर्यदेव ने उद्विग्नता से सचेत किया - ' सूतपुत्र ! रथ बढ़ावो, मेरा वंश कट रहा है | यदि मैं आकाश का सूर्य अस्त नहीं हुआ , तो धरती का सूर्य अस्त हो जायेगा " और अरुण ने ऐड लगायी | सातों घोड़े सरपट दौड़ने लगे | सूर्यदेव को उनका भागता हुआ रथ बड़ी तीव्र गति से पश्चिम की ओर लिए जा रहा था . फिर भी वे मुड़-मुड़ कर देखते जा रहे थे धरती के सूर्य के सामर्थ्य को | कभी कौतुहल से , तो कभी ईर्ष्या से ; कभी पितृ स्नेह से , तो कभी मोह से |
क्रमश :...........


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Comments :

1
ताऊ रामपुरिया said...
on 

अदभुत और जबरदस्त.

रामराम.

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