वाह शाहपुरा ! वाह !!

चित्रपट चल रहा था द्रश्य बदल रहे थे उन्ही द्रश्यों में
शाहपुरा के संस्थापक सुजान सिंह को मैंने कंधार में पठानों का खून बहते देखा | मुगलिया सल्तनत को ख़त्म करने के लिए उसी सूजान सिंह को जसवंत सिंह के साथ फतेहाबाद में औरंगजेब से लड़कर अपना जीवन का अंतिम खून पांच पुत्रों सहित बहते देखा | मैंने बीजापुर में दौलत सिंह के शरीर पर लगे, एक बरछी,पन्द्रह तीरों और चार तलवारों के घावों से खून बहते देखा | मैंने भरतसिंह को गोलकुंडा के बसंतगढ़ किले में शत्रुओं का खून बहाते देखा | मैंने उम्मेद सिंह को देखा जिसने हर निर्बल पक्ष का समर्थन कर सबल आततायी का खून बहाया | क्षिप्रा के तीर पर मैंने उम्मेद सिंह का अद्भुत और अपूर्व पराक्रम देखा | जिसने महाराणा की सेना के साथ सिंधिया की सेना से इतना अभूतपूर्व और लोमहर्षक युद्ध किया कि बहते हुए खून से क्षिप्रा नदी का पानी समुद्रपर्यंत लाल हो गया | मैंने पारोली के पास शाहपुरा की स्वतंत्रता के लिए रण सिंह को मरहटों का खून बहाते देखा | मैंने महाराजाधिराज अमर सिंह को प्रजापालन करते गोगुन्दा के पास डाकुओं का खून बहाते देखा | जब खून बहाने का इतिहास बंद हुआ तो आर्य धर्म की प्रतिष्ठा के लिए बदले हुए खून को शुद्ध करते हुए देखा | यज्ञों और वेदमंत्रों का पुनरूद्धार होते देखा और मेरे मुंह से निकल पड़ा वाह शाहपुरा ! वाह !!
स्व.श्री तन सिंह जी
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