क्षिप्रा के तीर -1

चलूँ ! मालवा धरा निमंत्रण दे रही है | दो अँगुलियों से घूंघूट उठाकर देख रही है , मुझे आते हुए | उसके हरे भरे आँचल में आग की धड़कने सिमटी हुई है | ज्यों -ज्यों उज्जैन नगर समीप आ रहा है , त्यों त्यों रेलगाड़ी हांफती हुई जैसे पहुँचने के आतुर हो रही है और मैं बैचेन हूँ , यह ढूंढ़ने के लिए , कि इस नगरी में हृदय की वह कौनसी आग है - वह किसकी स्मृति है , जो दबे पांव शमशान घाटों पर मेरी प्रतीक्षा किया करती है |
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भूतकाल की यह अविन्तिका नगरी वर्तमान की उज्जयनी है | यहाँ एक ओर मुझे राजा भर्तहरी नीति, श्रंगार और वैराग्य का समन्वय करते हुए आकृष्ट कर रहे है , वहां दूसरी ओर विक्रमादित्य और भोज निमंत्रण दे रहे है | यहीं कालिदास का मेघदूत मुझे कोई नवीन सन्देश देने को आतुर है , किन्तु इससे से परे मेरा खून मुझे बुला रहा है | एक टीस , एक धड़कन जो युगों से मेरे हृदय को स्पंदित कर रही है ;जैसे कह रही है - ' दुनियां ढूंढ़ रहे हो, तो यहाँ आकर भी देखो , मेरे हृदय में भी शोले है , जिन पर राख चढ़ती जा रही है |' इतिहास का एक पन्ना फडफड़ा कर फट रहा है और मैं हृदय की गहरी गलियों में भटकता खो सा रहा हूँ - कौन है वह , जो मुझे अपना समझकर मिलना चाहता है ? तो चलूँ कोने कोने और कण-कण को ढूँढू - शायद कोई बिछुड़ी हुई वेदना मिलन के लिए कराह रही हो | शायद किसी महान हृदय का अंतिम अरमान धूल-धूसरित होकर अंतिम तोड़ रहा हो ; शायद कोई यादगार -कोई सुनहली यादगार अपनी आयु के लिए दामन पसारकर संसार से भीख मांग रही हो ; शायद किसी युग पुरुष के जीवन की अंतिम विदाई संसार के नाम कोई दर्दभरी पाती लिखकर किसी संदेशवाहक की प्रतीक्षा कर रही हो और मेरे कदम चल पड़े |

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हाँ !
यही रेलवे स्टेशन है | सीधे चले जाइए |
यह चक्रतीर्थ का श्मशान घाट है | यहाँ चिताएं चल रही है | कहीं भाग्य की आग में दुर्भाग्य जल रहा है , तो कहीं दुर्भाग्य की आग में भाग्य | कई जल कर बुझ गयी है और कई बुझकर काल की आंधी के साथ राख बनकर उड़ गयी है | यहाँ कई ललनाओं का सिंदूर अंगारों में जलकर कजला गया है | कई बनती और बिगडती राज्य लक्ष्मियों की गाथाएँ इतिहास निर्माताओं की चिता पर सती हो गयी | यहाँ नन्ही नन्ही कलियों की किलकारियां संसार की अनित्यता से झूझती हुई विश्राम कर रही है | यही कहीं विक्रमादित्य और भोज जैसे लोकप्रिय और निष्पक्ष शासकों की पवित्र स्मर्तियाँ काल के कदमो से कुचली जा रही होगी | समीप ही कालिदास की लेखनी किसी नई कल्पना की प्रतीक्षा में थककर सो रही होगी | मृत्यु और शांति का यहाँ शाश्वत गठबंधन है , पर नीरवता के इस एक छत्र साम्राज्य में वह कौन है , जो मुझे बुला रहा है - घोड़े पर चढ़ा हुआ , हाथ में भाला लिए | तो सुनें , उसके पास जाकर , वह क्या कहना चाहता है ?
क्रमश:.........

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Comments :

1
ताऊ रामपुरिया said...
on 

इस पोस्ट मे मालवा की उज्जयिनी नगरी का तत्कालीन विवरण बहुत सटीक किया गया है.

रामराम.

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