क्षिप्रा के तीर -4

भाग-1 , 2 , 3 से आगे.............
इतना होते हुए भी मुझे देश निकला दिया गया | मेरी अटूट निष्ठां और सतत सेवा के बदले मुझे काले वस्त्र ,काला घोडा और काली ढाल मिली | मैंने इस उपहार को भी ख़ुशी से स्वीकार किया और मैं चल पड़ा उस माँ मरुधरा से , जिसके लिए मैं तीस वर्षों तक पहाड़ों की खोहों में , नदियों ,घाटियों और बालू रेत के टीलों में भटकता रहा | जिसके लिए मैंने घोड़े पर ही दिन गुजारे ,घोड़े पर ही रातें गुजारी , घोड़े पर बैठे ही खाना पकाया और घोड़े की पीठ पर ही बैठ कर खाया | लेकिन रवाना हुआ तब कोई नहीं कह सकता , कि अपने बुढ़ापे के सहारे के लिए एक लकड़ी भी वहां से उठाई हो | कोई नहीं कह सकता कि विदा के समय निराश होकर मैंने देशवासियों को गाढे राम-राम कहें हो | कोई नहीं कह सकता कि मातृभूमि के प्रेम के कारण उस समय मेरी आँखों में विवशता का एक आंसू भी टपका हो | मैं तो ऐसे चल पड़ा जैसे कोई बंजारा अपनी बालद लेकर चल पड़ा हो | ऐसे चला गया , जैसे किसी दूर देश का पंछी रात का बसेरा छोड़कर फिर अपने वतन के लिए उड़ जाता हो | न किसी को दोष दिया , न किसी को भला बुरा कहा | मैंने समाज चरित्र की भी लाज रखी |
मैं चलता गया चलता गया | न किसी ने मेरा कुशल पूछा , न किसी ने मेरी व्यथा सुनी ; मालवा की भूमि छोड़ी ; किसी ने मुझे यह नहीं कहा ,कि मुसाफिर ! तुम थक गए हो , थोडा रुक कर विश्राम भी कर लो | पर इस स्थान पर क्षिप्रा की लहरों ने मुझे रोका | मेरी मनुहार की , अपना आँचल पसारा और मेरे पैर रुक गए | इन लहरों ने मुझे नहलाया , मुझे पवित्र किया और कभी जाने नहीं दिया | इस पावन सरिता ने मुझे कहा था , " दुर्गादास ! दुनियां की कृतध्नता का कभी ख्याल भी मत लाना !' और मैंने उदारता की लाज रखी |
तुम रो रहे हो |
मैंने आंसुओं को निर्बल समझा है | कर्तव्य पालन के उन दिनों में मेरी आंख से कभी आंसू नहीं निकला | भावना को सदैव मैंने कर्तव्य की दासी बनाकर रखा था , पर इस सजल क्षिप्रा के तीर मेरी आँख का संचित धन बह पड़ा , तब मैंने छुट्टी दी बहो ! आज और केवल आज, जी भर कर जितना बहना चाहो , बहो ! फिर कभी यह शिकायत मत करना कि दुर्गादास ने आंसू नहीं बहाया | आँखों ने मेरी और मैंने आँखों की लाज रखी |
इस नदी के किनारे मैं जिन्दगी भर तडफता रहा | अरमानो की आग में जलता रहा | उपेक्षा की निर्लज्जता में सड़ता रहा , परन्तु यह कोई नहीं कह सकता , कि मेरे मुंह से एक बार भी ' उफ़ ' निकला | वि.स.१७७५ की मार्गशीष शुक्ला एकादशी की अंतिम बेला में मेरा पार्थिव शरीर इस क्षिप्रा के तीर अपनी जननी और मातृभूमि से कोसों दूर जल गया | मेरी चिता मातृभूमि की गोद के लिए तरसती रह गयी | नौ कुंटी मारवाड़ में मुझे एक कूंट क्या , तीन हाथ जमीन भी अंतिम विश्राम के लिए नहीं मिली | मेरे जीवन में कितने साथी थे , पर अंत समय में मैं अकेला था और मेरी अर्थी उठाने वाले आठ हाथ भी मालवा के थे | अंतिम इच्छा एक बार मातृभूमि के दर्शन मात्र की थी , पर जिन्दगी में इतनी इच्छा जला डाली , तो इस इच्छा को भी चिता के साथ सदा के लिए जला डाला | परन्तु सामर्थ्यवान होकर भी मैंने किसी नियम और मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया | मैंने समस्त मर्यादाओं की मर्यादा की लाज रखी |
इस समाधि से मैं देखता रहा | समय ने इतिहास के पन्ने पलटने शुरू किये | मैंने देखा - भाई ने भाई को भुला दिया और वे आपस में लड़ने लगे | परिणामों के भय ने कर्तव्य को भुला दिया और वे कूटनीति की छलना में छले गए | शत्रु के टुकड़ों पर आँख गड़ा कर मेरे स्वाभिमान और गौरव को लज्जित किया गया | मेरे विजयी जीवन को शाश्वत हार में बदल दिया गया | फिर भी मेरी जय-जैकार की निर्लज्जता प्रदर्शित करने लगे |
यह सब देख मैं दुःख और पीड़ा से तिलमिला उठा , यधपि मैं जीवन भर कभी दुखी नहीं हुआ | मेरी आत्मा तडफती रही किन्तु उनके तो दिल पत्थर के हो गए थे | मैं धिक्कारता रहा , किन्तु उनके कान बहरे हो चुके थे | तब मैंने सोचा - मैं निपूता ही मरा था |
क्रमश: .........

वीर शिरोमणि दुर्गादास राठोड़ |
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Comments :

1
ताऊ रामपुरिया said...
on 

बहुत ही लाजवाब चित्रण चल रहा है.

रामराम.

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