क्षिप्रा के तीर -5

भाग -1, 2, 3, 4 से आगे ...
मेरी समाधि पर फूल चढ़ाये गए | मेरी गाथाएँ लिखी गई | मेरे वियोग में कविताएँ पढ़ी गई | मेरी जयन्तियां मनाई गई | मेरे लिए आंसू बहाए गए , लेकिन न उन फूलों में सौरभ था ; न उन गाथाओं में में आग थी ; न उन कविताओं में वेदना थी ; न उन जयन्तियों में कर्मठ श्रद्धा थी और न उन आंसुओं में असली पानी था | मैं हैरान हो गया | लोग मेरा अभिनय तो इतना करतेहै , पर सही अर्थों में मुझे कोई जानता ही नहीं |
उत्तेजित होकर मैंने इतिहास की किताब ही बंद कर दी | मैंने बादलों को सैकड़ों बार कहा - ' बादलो ! तुम मारवाड़ में तो बरसते ही नहीं हो ! वही जाते जाते तुम्हारे आंसू शायद सूख जाते है ? तो लो मेरी व्यथा को ले जावो | सागर सिमटे हुए है मेरी व्यथा में , और इसे ले जाकर मेरे देश वासियों के आँगन में बरसाओ | वह धरती मेरी व्यथा के लिए तरस रही है और मेरे आंसू उस धरती के लिए तरस रहे है | ' पर बादल मेरी क्या सुनते जब मेरे मालिक ने भी मेरी बात नहीं सुनी |
इसी क्षिप्रा के तीर मैंने सैकड़ों ग्रीष्म ऋतुएँ भी देखि है | पश्चिम दिशा से बहने वाली लुओं (गर्म हवाओ) से मैंने एक बार अनुरोध किया था , कि तुम तो मेरी मातृभूमि के ऊपर से आई हो , फिर अपने साथ उस देश की राज क्यों नहीं लाई , जिसको मस्तक पर लगाकर मैं धन्य होता ? पर वे भी बेचारी बेबस थी , क्योंकि उन्हें भी काल ने मारवाड़ से निष्कासित कर दिया था | वेदना और व्यथा से वह गर्म-गर्म निश्वास मेरे पास छोड़कर चली जाती है |
इस क्षिप्रा के तीर मैंने सैकड़ों शिशिर और हेमंत ऋतुओं से अनुरोध किया था - रहम करो, मेरे देश के बंधुओं पर ! उनके खून में बंधुत्व की गर्मी आने दो | देश प्रेम की आग धधकने दो, कर्तव्य के ज्वालामुखी फटने दो , कुछ कर गुजरने के शोले भड़कने दो ; पर वे किसी व्यापक षड्यंत्र के सक्रिय मोहरों की भांति मेरे अरमान को ठंडा करती गई | सोचता हूँ क्या करूँ ? कुछ कर भी नहीं सकता , कहाँ जाऊं ? विवशता से मैंने इसी स्थान पर शताब्दियाँ गुजार दी |
पर हाँ , तुम कैसे आये ? तुम तो मेरी मातृभूमि से आ रहे हो न ? तुम निश्चित ही मेरे देश से निर्वासित नहीं हो , क्योंकि न तुम्हारे वस्त्र काले हैं, न तुम्हारे पास काल घोडा या काली ढाल ही है | तब सुनो , मेरे बंधू ! वापिस लौटकर जाओ तो मेरा भी एक करना | जब मेरी मातृभूमि आये , तो पहला कदम उस पर रखने से पहले उस धरती को मस्तक से लगाना और कहना - ' दुर्गा ने तुझे प्रणाम कहा है और यह भी कहा है , कि कभी कभी आशीर्वाद तो किसी आते जाते के साथ भेज दिया करो |' मेरे गाँव जावो और पुरानी और जीर्ण खेजडियों और बोरडियों को देखो , तो उन्हें भी कहना - ' तुम्हारा दुर्गा तुम्हारे समाचार सदा पूछता रहता है और खुद भी आ सकता है पर कर्तव्य उसे आने नहीं देता | वह अपना कर्तव्य पालन कर रहा है |' यदि तुन्हें मेरे मगरों के मोर दिख जाये तो उन्हें पूछना - ' तुम अपने दुर्गा को भूल तो नहीं गए हो ? ' और उन्हें मेरी और से अब के श्रवण मास में क्षिप्रा के तीर आने का निमंत्र्ण देना , कहना - उसने तो यह मगरे २०० वर्ष पहले ही छोड़ दिए , एक वर्ष तो तुम भी इन्हें छोड़कर उसे मातृभूमि की बातें सुनाओ |'
यदि कभी जोधपुर जाने का काम पड़े , तो महाराजा से आरज करना , कि आपका सेवक आपकी आज्ञा का सदियों तक पालन करता रहेगा | धरती बदल जाएगी , आसमान बदल जाएगा , इतिहास, काल और इंसान बदल जायेगा ; लेकिन आपका सेवक दुर्गा आपसे और आपकी आज्ञा से कभी नहीं बदलेगा | प्रलय के बाद भी उनकी आज्ञा बिना मैं मारवाड़ में एक कदम भी नहीं रखूँगा | यदि भगवान् न करे पर अजीत सिंह की तरह विपत्ति उन पर आ जाय , वे छोटे हों , तो कहना - आधी रात को भी याद करना , वह पैरों में जूतियाँ भी नहीं पहनेगा और दौड़ता हुआ चला आएगा |
और हाँ ! मैं तो भूल ही गया | एक बात और भी करना | यदि कर्तव्य की राह पर मिटने वालों के कभी मेले लगें , तो उन्हें भी कहना कि तुम्हारी महान परम्पराओं कि सच्ची राह पर ईमानदारी से मर मिटने वाला तुम्हारा ही एक अदना भाई क्षिप्रा के तीर पड़ा है | यदि ऐसे मेले पीपलून के पास पहाड़ियों में हलदेश्वर के पास लगे , तब उन पहाड़ों की प्रत्येक गुफा और उनका प्रत्येक पत्थर यही कहेगा - इन खोहों और पगडंडियों पर कभी दुर्गादास भी चला था , इन्ही रुंखों (पेड़ों) की छाँव में बैठकर वह पसीना पोंछा करता था , इन मैदानों और जंगलों में कबिओ दुर्गादास के घोड़े चरा करते थे |'

क्रमश:.................


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Comments :

4 comments to “क्षिप्रा के तीर -5”
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
on 

यह आलेख बहुत भावपूर्ण बन पड़ा है। यह लेखन बहुत ही अनूठा है।

Sadhana Vaid said...
on 

अत्यंत हृदयग्राही आलेख ! बहुत सुन्दर !

ताऊ रामपुरिया said...
on 

लाजवाब.

रामराम.

usha said...
on 

touching...realy heart touching.....kya likhti h ye kalm......

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