होनहार के खेल -4

भाग-1, 2, 3, से आगे ....
पर होनहार क्या जबाब देता ? उसने आज तक मेरे किसी सवाल का उत्तर नहीं दिया है | उत्तर तो होनहार की शरारत का मैंने दिया था | महारावल लूणकरण के समय होनहार ने छल करना चाहा था | मैंने अपने मालिक को कहा - ' विवाह तो हो गया पर मेरा गौना कब होगा ? ' लूणकरण ने कहा था - ' क्यों अधीर होते हो , अवसर आने पर यह काम मैं कभी भी करवा दूंगा |' वह अवसर तब आया , जब होनहार ने कंधार के अमीर , अमीरअली खां के हाथों संवत १६०७ में डोलियाँ भेजी , कि यह अंत:पुर में मिलना चाहती है | पर मैंने प्रथम द्वार पर ही पहचान लिया , कि होनहार मुझसे शरारत करना चाहता है | उस बेचारे से समझने में भूल हो गयी , कि मैंने मौत से कितनी बार शरारतें की है | इस बार भी वही केसरिया बाना, वही कसूम्बा , वही राग , वही रंग | महारावल लूणकरण अपने चार भाईयों और तीन पुत्रों सहित मेरे गौने के लिए परलोक चले गए और वहां से मेरे लिए दुल्हन भेज दी | मैंने उसे अंत:पुर में भेज दिया और प्रथम मिलन के मादक क्षणों की उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा करने लगा | द्वारपाल ने देखा चिता सजाने और आग लगाने जितना समय ही नहीं रहा , तब समस्त अंत:पुर को तलवार के घाट पर धरा स्नान करवा दिया गया | और मेरी दुल्हिन भी प्रेम की दुनिया बसाकर उसी में विरह की आग लगाकर चली गयी | तुम इसे आधा शाका ही कहोगे , पर मेरे लिए पुरे से अधिक था | मेरा घर तो इसी शाके में बन कर उजड़ गया | अब भी खड़ा हुआ मैं संसार में इस बात का गवाही हूँ कि जैसलमेर में ढाई नहीं तीन शाके हुए |
चितौड़ में तीन शाके हुए , यह कहकर मुझे तुम उसकी तुलना में छोटा भले बता लो | मुझे चितौड़ से ईर्ष्या बिलकुल नहीं है , पर होनहार को कभी मुझसे ऊँचा नहीं बता देना | मुझे अपनी आन और मान प्रिय है और इसीलिए रावल लूणकरण की पुत्री उमादे जीवन भर अपने पति मालदेव का परित्याग कर संवत १६१९ की कार्तिक सुदी १२ को उसी पति के पीछे सती हुई | मुझे छोटा बताकर भी तुम मेरे खानदानी रक्त को छोटा मत बता देना | मैंने अपनी खानदानी आन के लिए होनहार का सदैव पीछा किया | वह जब कभी मुझे दिखाई दिया , मैंने खदेड़ कर उसे भगा दिया और उसके पदचिन्हों पर पुरुषार्थ का पानी छिड़क कर तलवारों की छांह में इतिहास और संस्कृति के पौधे लगाए | मेरी सीमा में मैंने होनहार को कभी सांस नहीं लेने दी | आखिर तंग आकर वह भाग खड़ा हुआ और सुदूर पश्चिम सीमा पर बलोचों से मिल गया | जब बलोचों ने होनहार की शह पाकर उपद्रव खड़े किये , तब मैंने फिर उसका पीछा किया | रोहिड़ी के पास संवत १७५८ में उसके और महारावल अमर सिंह के दो दो हाथ हुए | धार से धार और अणि से अणि जब बजने लगी , तो पृथ्वी त्राहि -त्राहि करती हुई मेरे चरणों में गिर पड़ी और आकाश कांपते हुए सिसकियाँ भरकर कहने लगा - आखिर तुम क्यों होनहार के पीछे पड़े हो ? इस मनुहार पर मैं लौट पड़ा | लौटते समय आषाढ़ सुदी अष्टमी को उसी युद्ध-क्षेत्र से कुछ दूर पर मेरी कुल-ललनाओं को मैंने सती होते देखा | अब कोई क्या कहेगा कि मैंने यह क्या कर डाला और क्या नहीं कर डाला |
उस दिन के बाद निश्चिन्त होकर ढाई सौ वर्ष तक मैंने खूब भोग भोगे | क्रमश:............

ज्ञान दर्पण : जैसलमेर का किला देखिये
मेरी शेखावाटी: यातायात का एक साधन जो केवल शेखावाटी मे है |
राजस्थान के लोक देवता श्री गोगा जी चौहान

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Comments :

2 comments to “होनहार के खेल -4”
ताऊ रामपुरिया said...
on 

जबरदस्त श्रंखला.

रामराम.

जयपालसिंह गिरासे said...
on 

Jay Matadi HKM; its an Amazing work.Really inspiring for us.

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