होनहार के खेल -2

भाग-1 से आगे ......
देवराज की चौथी पीढ़ी पर भोजदेव ने शहाबुद्दीन गोरी की फ़ौज का सामना किया उर होनहार ने लुद्र्वा की रौनक सदा के लिए छीन ली | पर जैसल ने भोजदेव के उत्तराधिकारी के रूप में मुझ जैसलमेर दुर्ग को बसाया | संवत १२१२ से आज तक लगभग ८०० वर्षों में मैं इसी स्थान पर खड़ा हुआ , रास्तों को बदलते हुए , धरती को बदलते हुए , इंसान और इतिहास को बदलते हुए देख रहा हूँ | कभी इस जगह घोड़ों और ऊँटो को दौड़ते देखा था आज उन्ही राहों पर मोटरों को दौड़ते देख रहा हूँ |और कभी नगारें बजाती फौजों को देखा था और आज सिर्फ यात्रियों को आते जाते देख रहा हूँ | कभी जिन्दगी के कारवां और मौत के काफिले देखे थे और आज तकदीरों की उथल-पुथल को देख रहा हूँ , जीवित कौम के अंदाजे और नियति की अदाएं देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ - ' होनहार ने क्या कर डाला ? '
एक दिन बड़ी अवेर होनहार ने मेरा दरवाजा खटखटाया | दिन ढल चूका था और संध्या समीप थी | जिसक के पौत्र और राव केल्हण के पुत्र चाचकदेव ने देखा बाल सफ़ेद आ रहे है , जरा ने अपना सन्देश भेज दिया है , अब मृत्यु का मुकाबला खाट पर किया जाय अथवा होनहार को दो हाथ दिखाकर किया जाय | जब चाचकदेव ने मेरी और प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा , तब मैंने भक्तिभाव से उत्तर दिया था - ' नहीं , मेरे मालिक ! होनहार के समक्ष झुको नहीं , उससे रणभूमि में लोहा लो ताकि आने वाली पीढ़ी को मैं कह सकूँ -कि उनके पूर्वज खाट पर पड़े मौत का इन्तजार नहीं किया करते थे , किन्तु मौत की खाट पर बैठ कर उसका गला दबोच लेते थे |' और मेरा मालिक मुल्तान के लंगा को रणदान देने गया ' हम ५०० सवार लेकर सिर्फ होनहार से लड़ने आ रहे है | कृपा पूर्वक हमारा रणदान स्वीकार करो | ' ऐसे बांके दानी न लंगा ने कभी देखे और न कभी सुने | मुल्तान का बादशाह तिगुनी फ़ौज लेकर आया उसने देखा - चाचकदेव ने मुट्ठी भर सेना से वास्तव में होनहार के छक्के छुड़ा दिए | रणक्षेत्र में मुल्तान का बादशाह सो गया , चाचकदेव और दोनों सेना के सिपाही सो गए | मौत के समय मेरे मालिक खाट पर नहीं , मौत का सिरहाना देकर कर्तव्य -क्षेत्र में सोया करते थे , फिर होनहार को क्या दोष दूँ कि उसने क्या कर डाला ?
चाचकदेव के पौत्र महारावल जैतसी का राजतिलक संवत १३३२ में हुआ | एक सौ बीस वर्ष का मैं भी जवान हो गया था | मैंने भी सोचा -यौवन की इन उछलती हुई घड़ियों में मौत की ठिठोली कर मैं भी दो एक कहकहे लगा दूँ | महारावल के राजकुमार मूलराज और रतन सिंह को कहा - ' मेरी सगाई करो |' वे नारियल लेकर दूर-दूर तक फिर आये | भक्खर कोट से दिल्ली जाने वाले अल्लाउद्दीन के भरे खजाने लुट लाये | अन्तोत्गात्वा संवत १३६१ में बादशाह अल्लाउद्दीन की और से कमालदीन टीका लेकर आया | बारह वर्ष तक वे मुझे घेरे बैठे रहे और अंत में हारकर वापस जा रहे थे , कि मैंने मूलराज व रतन सिंह से कहा - ' ये तो जा रहे है , फिर मैं तो कुंवारा ही रहूँगा |' तब संवत १३७३ में दरवाजे खोले गए | मेहमान और मेजबान खूब जी भरकर मिले | इधर तलवारों से तलवारें मिल रही थी , भालों से भाले मिल रहे थे , तीरों से तीर और घोड़ों से घोड़े मिल रहे थे | मिल-मिल कर लौट जाते थे, मेरे चरणों पर | मेरे भाल पर उस दिन अनगिनत टीके लगाये गए | कुमकुम इतना बिखर गया कि उससे धरती और आकाश लाल हो गए , मेरी खुशकिस्मती और बदनसीबी भी लाल हो गयी अंत में वह बहने लगी | निश्चय ही कालिका का खप्पर फूट गया था या फिर भर कर छलछला गया था | होनहार घबडा उठा - बंद करो ये उत्सव | लेकिन मैंने भी होनहार को दंग करने की ठानी थी | बांह पकड़कर मैं उसको अंत:पुर के भीतर ले आया और उस प्रज्वलित अग्नि को दिखाया , जिसमे रनिवास खुद रहा था | विधाता का दिया हुआ , बुद्धि को बेहोश करने वाला सोंदर्य , कुल-परम्परा का दिया हुआ मस्तक को गर्वोन्नत करने वाला समस्त शील और किस्मत का उदारता से लुटाया हुआ सुहाग भी धधकती हुई अग्नि के भूखे पेट में समा रहा था | मैंने होनहार से कहा - ' जरा देख ! हिमालय में हड्डियाँ गलाने , काशी में करवट लेने और असंख्य वर्षों तक सृष्टि दहलाने वाली तपश्चर्या के बाद बड़ी कठिनाई से प्राप्त होने वाले राज्य श्री के वैभव -सुख- सुहाग और संपत्ति को मेरे मालिक कितनी बेपरवाही से लुटा रे है |' होनहार क्या देखता ? उसने तो आँखे बंद करली थी और उसकी बंद आँखों से दर्द भरे आंसू टपक रहे थे | सिर धुनते उसने बस इतना ही कहा - ' हृदयहीन ! यह कैसी तेरी सगाई ? यह कैसा उत्सव ? उफ़ ! तुमने यह क्या कर डाला !'

क्रमश:................

ज्ञान दर्पण : उत्तर भड़ किंवाड़ |
मेरी शेखावाटी: राजस्थान कि ओर्गेनिक सब्जी|
जिधर से भी गुजरता हूँ

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Comments :

2 comments to “होनहार के खेल -2”
Udan Tashtari said...
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अच्छा लगा पढ़कर. आभार.

ताऊ रामपुरिया said...
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बहुत लाजवाब.

रामराम.

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