मै निर्झर हूँ

मै निर्झर हूँ पर्वत बह गहरा नीचे तक आया हूँ |
पगली धरती के आँचल को मै तीर्थ बनाने आया हूँ ||

मै पत्थर का प्यार लिए , धरती तक उमड़ा आता हूँ |
जिनके शीश उठे ऊँचे , मै उनकी विनय बहा लाता हूँ -२
गुमराह हठीलों के प्रांगण में मै अलख जगाने आया हूँ ||

कल कल कलरव करता हूँ पर समझ न सकते भावों को
और क्विंचित बनूँ नीरव , क्या देख सकोगे घावों को -२
किन्तु ज्ञान को नहीं मै अपना स्वप्न सुनाने आया हूँ ||

सफल बनूँ या नहीं बनूँ मै फिर भी बहता जाता हूँ
अपने तप की ले मशाल , मै ज्योति जगाता आता हूँ -२
हारे अर्जुन को कर्मयोग का पाठ पढ़ने आया हूँ ||

वे कहते थे कुछ नहीं होगा आखिर संशय है हारा
अगणित बिंदु परस्पर मिलकर , बनी एकता की धारा-२
मेरी कुटिया जाग तेरा इतिहास लिखाने आया हूँ ||

स्व.श्री तन सिंह जी : १८ दिसम्बर १९६२

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