धन्य प्रतापगढ़ ! धन्य !!

चित्रपट चल रहा था द्रश्य बदल रहे थे उन्ही द्रश्यों में
मैंने महारावत सूरजमल का जीता जागता स्मारक प्रतापगढ़ राज्य देखा | चित्तोडगढ के पाडलपोल पर मैंने महारावत बाघ सिंह का स्मारक देखा जो निर्वासित होकर भी मातृभूमि पर विपत्ति के समय उसकी सहायता के लिए दौड़ा आया | उसी स्मारक के पास गुजरात के कृतध्न सुल्तान बहादुरशाह की सेना के अनेक सिपाहियों की लाशों के ढेर देखे | हल्दी घाटी में महाराणा की और से कान्धल को लड़ते देखा और वहीं कहीं पत्थरों में सोये उसके स्मारक को देखा | पास ही उसी के भतीजे किशनदास के स्मारक के भावनाओं के भग्नावशेष देखे | मैंने जीरण में तालाब पर महारावत भानु सिंह का स्मारक देखा जिसने चिताखेडा की लड़ाई में मियां मक्खन को यमलोक पहुँचाया था | उदयपुर के चम्पाबाग के बाहर मैंने महारावत जसवंत सिंह का और उसके पुत्र महासिंह का स्मारक देखा | मैंने सालम सिंह को देखा जिसने तुकाजीराव होल्कर और बाद में मल्हारराव द्वितीय के प्रतापगढ़ के तीन-तीन मास के घेरे विफल कर दिए |मैंने पिंडरियों और पेशवाओं के प्रतापगढ़ पर आक्रमण देखे | थोड़े होकर भी स्वातन्त्र्य के लिए उत्सर्ग होने वाले अनेक वीरों के स्मारक देखे और मेरे मुंह से निकल पड़ा धन्य प्रतापगढ़ ! धन्य !!
स्व.तन सिंह जी द्वारा लिखित
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