सपने भोर हो गई

सपने भोर हो गई
नींद थी मीठी मीठी चूर हो गई || सपने ....

एक हाथ से बजी थी ताली , मै भोला या तू भ्रम खाली
सुन्दर आशाओं की लाली , धूल हो गई || सपने .......

किसके घर न लगाई फेरी , धन की गठरी कहाँ न हेरी
अपनों की पहचान में मेरी , भूल हो गई || सपने .......

खून पसीने से सींची बगिया , तब मेहनत से चटकी कलियाँ
फूलों की डाली में भईया ,शूल है कई || सपने ...............

सांझ चला बंजारा जैसे , रात लिखी तक़दीर में ऐसे
अब सूरज से तोडूँ कैसे , प्रीत है नई || सपने .......

बढे बिना नहीं काम बनेगा , एक अकेला क्या न करेगा
जीवन की राहों पे मिलेगा , कोई तो भाई || सपने ......

स्व.श्री तन सिंह जी : १ मार्च १९६३

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