जागरण की वेला का

जागरण की वेला का तू कौनसा सितारा है |
मेरे मीठे सपनो का तू कौनसा इशारा है ||

जिन्दगी की बाजी में किस्मतों का फेरा है
गूंजता रे दुश्मनों की जीत का नगारा है
काल की नदी का तू कौनसा किनारा है ||

फूलों का भरोसा दे काँटों ने ही पाला है
आज मेरी प्रीत का रे पतझड़ी सवेरा है
कौनसे रंगों का तू अजनबी चितेरा है ||

भेंट में क्या लाऊं मैं , कोई चीज नहीं दिखती है
सम्पति के राज को इन आँखों ने बिखेरा है
आंसुओं के मोतियों का बस जादुई पिटारा है ||

मुद्दतों से लौटा है मेरे दुःख सुख का गवाही रे
प्राण के हिंडोले में प्यार भी घनेरा है
भूल की टहनियों पे याद का बसेरा है ||

13 मार्च 1965


पन्ना धाय

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Comments :

1
ताऊ रामपुरिया said...
on 

बहुत लाजवाब रचना, आभार आपका.

रामराम.

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