नए आने वालो

नए आने वालो , तुम्हे साधना की , अनोखी परम्परा मुझे है सुनानी
सुखों को जलाके भी , सपने न टूटे , इसी पे हमें जिन्दगी है बितानी

ढूंढे सभी है सहारे , कहीं मिल जाये कोई हमारे
थके किन्तु हिम्मत न हारे , चमकाए नभ में सितारे

बहा हा युगों से यह मेहनत का निर्झर , कहीं बंधुओ सूख न जाए पानी
है गंगा की धारा सी ,पावन व लम्बी , हमारे बहे आंसुओं की कहानी ||

कोई गए कई आए , कई बैठे है झंडा गडाए
किसी से नहीं गिलाएं , सबसे चलते है आँख मिलाए

प्रतीक्षा किसी, प्रेम की हो न हमको , दगाबाजियाँ भी हमको है भुलानी
जमाना ख़ुशी से , हमें भूल जाए , अमर उसके दामन पे रखनी निशानी ||

हमने लुटाया कितना, कोई देगा हमें क्या इतना
हमने सहा है जितना , धरती सहेगी न उतना

हमें आने वाले , हमारे लहू की , कई युगों बाद आज कीमत है चुकानी
बिखरे है पत्थर , खंडहर पुराने , उसी नींव की नई गाथा बनानी ||

बाधाएं आएँगी हमको , अब तक न आई है किसको
चलना है मंजिल पे जिनको , लगेंगे ही कांटे उन्ही को

नया साथ साथी , नए है अभी पर , युगों की हमारी है प्रीत पुरानी
हिमालय से ऊँची , व सागर से गहरी , हमें अपनी निष्ठा को बनानी ||
8 दिसम्बर 1964

ज्ञान दर्पण : पन्ना धाय

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Comments :

1
संजय भास्कर said...
on 

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

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