दिया जले -----

दिया जले जल कर है जलाता , परवाने को क्यों बतला ?
जब तक न जलूं नहीं चैन मुझे मै दीवाना हूँ क्यों बतला ?

डाह भरी कुटिया पर मेरा महल हुआ मतवाला है ,
अपना सब कुछ बेच तभी कुटिया से लाया प्याला है |
मै चिल्लाता रे नशा यही मत बन पगले बन तू मस्ताना ,
मस्ती का घूँघट खोल जरा यह सर्वनाश का है बाना |
इस झूटी मस्ती से मतवाले को मै न जगाऊं क्यों बतला ||

जीवन की धारा अकुला गई और परम्पराएँ टूट गई है ,
किसे विवसना बना कौन दासी अब रानी बन गई है |
हम अपनेपन को भूल गए कुछ संभव हो तो याद करें ,
मोती बिखरे फिर भी अब तक पानी न गया कुछ ध्यान धरें |
मै मनिहारा बन बिखरे मोती पिरो रहा हूँ क्यों बतला ||

जग सोता है मेरी नींद गई वह हँसता मै चुप देखता हूँ ,
दीपमालिका उधर तो मै अब अपना दीप बुझाता हूँ |
घायल हूँ पर उठता हूँ तब घायल जग को कर देता हूँ ,
दर्द भरा मेरे सपनो में जीवन को उलझा देता हूँ |
कौन समझ पाया है मुझको मै कैसी उलझन हूँ बतला ||

स्व. श्री तन सिंह जी : १८ दिसम्बर १९५२ फुलेरा से जयपुर रेल में |

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Comments :

3 comments to “दिया जले -----”
Udan Tashtari said...
on 

आभार पुनः इसे पढ़वाने का.

ओम आर्य said...
on 

जग सोता है मेरी नींद गई वह हँसता मै चुप देखता हूँ ,
दीपमालिका उधर तो मै अब अपना दीप बुझाता हूँ |
घायल हूँ पर उठता हूँ तब घायल जग को कर देता हूँ ,
दर्द भरा मेरे सपनो में जीवन को उलझा देता हूँ |
कौन समझ पाया है मुझको मै कैसी उलझन हूँ बतला ||
bahut bahut bahut bahut bahut......sundar

नीरज गोस्वामी said...
on 

बहुत सुन्दर रचनाएँ...दोनों ही श्रेष्ठ हैं...
नीरज

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