देव तुम्हारे सन्मुख

देव तुम्हारे सन्मुख तुच्छ है पर हमको स्वीकार करो |
अरमानो का हार सजाया उसको अंगीकार करो ||

विधि की लहरे डोल रही
संकल्पों पर टूट रही
तुफानो में डगमग करती नैया का आधार करो |
भूले पथिको का ध्रुवतारा बनकर हमको पार करो ||
देव तुम्हारे सन्मुख तुच्छ है पर हमको स्वीकार करो ||

तुममे देश प्रेम की आभा
तुम जौहर की जलती ज्वाला
मेरी बुझती चिंगारी में अब तो कुछ अंगार भरो |
देव उपेक्षित इस जीवन में चाह भरो उद्दार करो ||
देव तुम्हारे सन्मुख तुच्छ है पर हमको स्वीकार करो ||

तेरी वेदी पर वीर चढ़े
सतियों के अरमान चढ़े
खाली अंजलि में सुन्दर से कुछ बलिदानों के फूल भरो |
तुमने दिया तव चरणों में है न्योछावर स्वीकार करो ||
देव तुम्हारे सन्मुख तुच्छ है पर हमको स्वीकार करो ||

स्व.श्री तन सिंह जी : २१ फरवरी १९५२

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Comments :

3 comments to “देव तुम्हारे सन्मुख”
AlbelaKhatri.com said...
on 

atyant uttam !
waah...........

संगीता पुरी said...
on 

बाड़मेर के पूर्व सांसद और श्री क्षत्रिय युवक संघ के संस्थापक स्व.श्री तन सिंह जी की लेखनि से सबका परिचय होना ही चाहिए .. बहुत अच्‍छी रचनाएं है .. अन्‍य रचनाओं का भी इंतजार रहेगा .. आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद !!

रंजन said...
on 

आप तन सिंह जी की रचनाऐं प्रकाशित कर बहुत अनुठा कार्य कर रहे हैं.. रचना के बारे में कुछ कहे ऐसी मेरी बिसात नहीं..

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