कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों

कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों नए युगों के निर्माता |
करो उपेक्षा भले काल की कौन काल से है बच पाता ||

विजय की देवी वरमाला ले गले डालने है आती |
कड़ी परीक्षा की बेला है शक्ति हमारी घबराती ||
ये संचय फिर कर लेना ,बनो भाग्य के खुद विधाता |
कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों नए युगों के निर्माता ||

कहाँ गई वह शक्ति तुम्हारी जिससे जग जय करना था |
भावों का सागर क्यों सुखा जीवन जिससे लहराता |
यह रोना तो फिर से रो लेना ,आज हंसो ये जीवन दाता |
कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों नए युगों के निर्माता ||

जीवन के टेढ़े मेढे पथ कहाँ कहाँ भटकायेंगे |
मेरे ये धिक्कार तुम्हारे कान कभी सुन पाएंगे ||
छलनाओं से छले न जाओ ,छला गया जो पछताता |
कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों नए युगों के निर्माता ||

यह वेदी सदियों से भूखी मांग रही बलिदानों को |
दिन आएगा फिर कब ऐसा पुरे कर अरमानों को ||
तोड़ो द्वेष प्रेम के बंधन , जन-जन के तुम मुक्ति प्रदाता |
कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों नए युगों के निर्माता ||

.स्व.श्री तन सिंह जी : १६ दिसम्बर १९५८

इससे जुड़ीं अन्य प्रविष्ठियां भी पढ़ें


Comments :

2 comments to “कदम तुम्हारे कांप रहे क्यों”
अनुनाद सिंह said...
on 

हिन्दी ब्लागजगत में स्वागत है।

अनिल कान्त : said...
on 

मुझे ये रचना पसंद आई

Post a Comment

 

widget

Followers