किसी बीते हुए युग की

किसी बीते हुए युग की हमें कुछ याद तडफाती |
कहो है कौन कि हमको देख जिसकी आँखे भर आती ||

जौहर भी दिखाया ,शाके को अपनाया |
खून भी बहाया , कभी न हिचका ||
बड़ा बांका था मतवाला ,हमें भी दे गया थाती |
उसी थाती को खोकर के ,हमारी आँखे भर आती |
किसी बीते हुए युग की हमें कुछ याद तडफाती ||

बदला है जमाना ,भूल गया मस्ताना |
करता है बहाना ,भटक ही गया ||
उसी पथ के तो बनजारे को पथ पै लाज है आती |
लगी है आग बुझने अब ,कभी शोले जो भड़काती |
किसी बीते हुए युग की हमें कुछ याद तडफाती | |

शत्रु ने हो घेरा , उजाला या अँधेरा |
प्रण भी है मेरा , कभी न झुकूँगा ||
मुसीबत से ही टकराने की , मेरे मन में है आती |
मेरे दिल की ही तडफन तो मुझे जीना है सिखलाती ||
किसी बीते हुए युग की हमें कुछ याद तडफाती ||

बारूद की ढ़ेरी ,आग की है देरी |
विजय होगी तेरी ,समझ तो जरा ||
हमारे मिल के जीने से तो बेबस मौत शरमाती |
पीकर खून दुश्मन का प्रलय की चीर दे थाती |
किसी बीते हुए युग की हमें कुछ याद तडफाती ||
स्व.श्री तन सिंह : २ नवम्बर १९५८

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Comments :

3 comments to “किसी बीते हुए युग की”
AlbelaKhatri.com said...
on 

jai ho
pranaam is adbhut urjaavaan lekhni ko !

परमजीत बाली said...
on 

बहुत सुन्दर रचना प्रेषित की आभार।

नरेश सिह राठौङ said...
on 

बदला है जमाना ,भूल गया मस्ताना |
करता है बहाना ,भटक ही गया ||
उसी पथ के तो बनजारे को पथ पै लाज है आती |
लगी है आग बुझने अब ,कभी शोले जो भड़काती |
किसी बीते हुए युग की हमें कुछ याद तडफाती | |
.... वाह कितनी सुन्दर बात कही है

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