चिता जल रही है

चिता जल रही है -चिता जल रही है |
मेरे अरमानो की चिता जल रही है ||

पायल की रिम-झिम में प्राण मस्ती में खो रहे ,
नयनों में निमंत्रण कई मौन हो सो रहे |
मै तो बढ़ना चाहता हूँ , प्रणय कहता है रुक जा ,
विप्लव की बेला कहती , सावधान हो जा |
चिता जल रही है - चिता जल रही है ||

नन्हे मुन्ने के बंधन ममता के छुट रहे ,
माताओ बहनों के धागे स्नेह के टूट रहे |
विकट कसौटी त्याग राग कोई समझा दे मुझको ,
किसे अपनाऊँ और किसे ठुकरा दूँ |
चिता जल रही है - चिता जल रही है ||

जिनको मुझे उठाना है वे बेखबर सो रहे ,
अपने कहलाने वाले आज पराए हो रहे |
दिल के घाव किसे बतलाऊँ कौन सहलाए इनको ,
अपनी शमा पर मै तो जला जा रहा हूँ |
चिता जल रही है - चिता जल रही है ||
स्व. श्री तन सिंह जी : १५ फरवरी १९५८

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Comments :

3 comments to “चिता जल रही है”
परमजीत बाली said...
on 

बहुत बढिया रचना प्रेषित की है आभार।

ओम आर्य said...
on 

चिता जल रही है - चिता जल रही है ||
kai baar aisa lagata hai ki jindagi har ek pal insani aramano ka chita jalane ka naam maatr hai ....our kuchh nahi hai ....bahut hi sundar baat likhi hai aapne aankhe nam ho gai

नरेश सिह राठौङ said...
on 

सुख वैभव छोड कर आगे बढने की प्रेरणा देने वाली रचना के लिये आभार ।

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