आई रे काली बदली आई

आई रे
काली बदली आई पंछी के मन भाई रे
नाचने की आज प्यारी-प्यारी ऋतू आई- प्यारी ऋतू आई

आज बूंद पूछे नदिया कहाँ को जाये
बहने वाले कहाँ ठिकाना पाये
कहाँ सिन्धु लहराता कहाँ कुआँ खाई
आशियाने की मैंने सीधी राहें पाई ||

दीप उजाला परवाने को हरषाये
घन गर्जन क्यों मोरों के मन भाये
मन का सारंग पूछे किसने बीन बजाई
जीवन की कविता की किसने मधुरिम पंक्ति गाई ||

आओ उड़कर अगम दिशाएँ छूलें
इस बगिया में कुसूमों से हम फूलें
मंजिल इतनी ऊँची और हम मंजिल के राही
फिर क्यों नहीं मीठी-मीठी बजने दें शहनाई ||
10 दिसम्बर 1966


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