अभियोगी रे

अभियोगी रे भरी कचहरी मेरा दोष बताना रे
क्या इन आँखों में पानी झूंठा , या झूंठा अभियोग ||

क्या वह तेरी आग नहीं है , जलते जिसमे प्राण
रे नादाँ तू भूल गया है ,हमको आती याद
समझो रे दर्द हमारा फिर चाहे जोर जताना रे ||

क्या हमने पाया है गिनले ,केवल तेरा रोष
क्या जोड़ा है जोड़ लगाले, जबसे संभाला है होश
फिर भी बेरी अपना बताके चाहे बैर चुकाना रे ||

तेरी हकुमत तेरा ही हाकिम ,मेरा तो अन्तर्यामी है
पूछ उसी से मेरा कसूर क्या, मै तो उसका अनुगामी
अन्यायी रे शूली चढाने से पहले आँख मिलाना रे |

इतने तूफां हमने सहे है , इक तेरा भी और
नाव अडिग और नाविक बहुत है ,मंजिल का आया छोर
तुमको क्या दे दोष एसा ही आया , सारा जमाना रे ||
स्व. श्री तन सिंह जी : 20 july 1963

इससे जुड़ीं अन्य प्रविष्ठियां भी पढ़ें


Comments :

0 comments to “अभियोगी रे”

Post a Comment

 

widget

Followers